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December 02, 2017

मैं कोई घाट बनारस का









मैं कोई घाट बनारस का
तुम सुबह की अलसाई आंखों सी
मैं तैरती कहानियों में भीगा भीगा
तुम आह मेरे दो सांसों की,

अल्हड़पन को डुबो डुबो कर
जब थक जाती है बांहे मेरी
एक धुंध में सब कुछ धुआं होता है
और तुम जान मेरे उन अहसासो की,

मैं कोई आंसू आहत आंखों का
तुम चैन की ठंडी बोरी सी
मैं फिरता आवारा गलियों में
तुम चाय भरी एक कटोरी सी।

टूटे सपने हाथ लिए
शहर-शहर भटका हूँ मैं
तुम ठाट-बाट में मस्त रही
रौशनी गली की इकलौती छोरी सी

मैं अक्खड़पन तूफानों का
खुद ही बिखरा, खुद को तोड़ते
तुम खिली रही अधरों पर मेरे
नए प्रेमी युगल की बाँछो सी

मैं शक्कर हूँ मीठा मीठा
हर प्याली में घुल जाता हूँ
तुम बाट जोहती महलों में
ताजी छौंक के झांसो सी।
मैं कोई घाट बनारस का
तुम सुबह की अलसाई आंखों सी
मैं तैरती कहानियों में भीगा भीगा
तुम आह मेरे दो सांसों की,

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