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December 04, 2017

Raanjhanaa x.O



अजीत बाबू ने पुराना पैंतरा भांजते हुए एक्सलेटर ऐंठ के पार्क का कोना कोना गुंजा दिया ,वहाँ बैठे सारे लोग उनके तरफ ही देखने लगे , मग़र मजाल की वो लड़की जिसके लिये ये कांड रचा गया था उसने मुड़के देखा भी हो।
नई नई आई थी वो इस मुहल्ले में , शायद ईद में किसी रिश्तेदार के यहाँ।
बिहार के छोटे से इस शहर के छोटे से मोहल्ले के निर्विवाद डॉन थे अजित बाबू।
मोहल्ले में मान-सम्मान थाकिसबके अजीज थे, लोग भरोसा करते थे उनपे। मुहल्ले के छठ घाट की सफाई से से लेके दुर्गा पूजा में DJ का परमिसन सब वहीं लाते थे। उम्र ज्यादा नही थी मगर उठना बैठना शहर के नामी गिरामी लोगो के साथ था। पुलिस इज्जत करती थी तो शहर के शोहदों में भी मान था। 
इन सब खूबियों के अलावा अजीत बाबू की मुख्य खूबी  थी उनका  आशिक़ मिज़ाज आदमी होना। चौबीस साल की उम्र में ही छतीस जगह कांटा भिड़ा हुए थे।वैचारिक रूप से भले ही वे सत्तावादी थे मग़र प्रेम के मामले में निहायती साम्यवादी।  शहर के मशहूर कॉलेज के टॉपर से लेके मोहल्ले की कामवाली बाई तक , सभी से उनके मधुरवत प्रेम  संबंध थे । इस मामले में वो जातीय और वर्गीय भेदभाव से भी अत्यन्त परे थे। अपरिचितों के लिए ये अचम्भा कर देने वाली जानकारी थी मगर जो परिचित थे वो उनसे रश्क़ खाते थे। जिनकी पहुंच उनके फोन गैलेरी तक थी वे अक्सर रात को गैलेरी के अंदर के अप्सराओं को तस्व्वुर कर ठंडी आंहे भरा करते थे।मग़र कहते है कि जिंदगी में सबकुछ ठीक ठाक, चकाचक , चौचक चल रहा हो तो समझा लो कहीं से बड़ा कटने वाला रहता है।मौका था माह-ए- पाक , रमजान के पहले दिन काशाम का वक्त था। काला कुर्ता , नीला चश्मा पहने , बाजू चढ़ाए अजित अपने यामाहा RX 100 पे बैठकर   मुहल्ले के मेनगेट पर आठ दस लौंडों के साथ इजलास लगाए हुए थे , तब तक सामने से एक रिक्शा आके रुका , अजीत ने नजर उठाई तो बीस - बाइस की साल की एक लौंडिया , उनके ओर ही देख रही थी , इस से पहले की अजित कुछ पूछ पाते की उधर से शहद में शक्कर मिश्रित आवाज आई ,"इधर शिव मंदिर कहाँ पड़ता है?
अजीत मन्त्रमुग्ध रह गए , इतनी मीठी तो कोयल भी नही बोलती , मग़र उन्होंने खुद को सम्भाला और कंठ को उच्चारण करने दिए, भरे गले से आवाज आई ," आगे से लेफ्ट ले लीजिएगा वहां से दिख जाएगा।लड़की ने रिक्शे वाले को चलने का इशारा किया और अजीत की तरफ देखते हुए बोली" थैंक्यू भैया"
असह्य बात हो गयी ये, अजीत ने घूर के जाते हुए रिक्शे को देखा और  ध्यानस्थ हुए की पता नही किस मनहूस का शक्ल देख लिये है , आज भोरे भोरे जो सुकन्या के मुँह से भैया सुनना पड़ा.
शाम के छः बजे रहे होंगे , अजीत मोहल्ले के जेनरल स्टोर पे रिचार्ज करवाने पहुंचे , आदतन अभी दुआ सलाम ही चल रहा था कि पीछे से आवाज आई भैया थोड़ा साइड दीजिये। अजित अभी कुछ समझ पाते कि वहीं रिक्शे वाली लड़की दनदनाती हुई दुकान में घुसी ,काउन्टर पे पैसे फेक के बोली," जल्दी से एक रूह अफजा का पैकेट दीजिये, इफ्तारी का वक्त हो रहा है , दूकानदर ने शीशी थमाई , शायद पैसे पहले से गिने हुए थे। इसलिए लड़की पैसे के हिसाब का इंतजार किये बगैर तेजी से  निकली। उसके इस गति ने उसके लहराते हुए दुपट्टे ने आसपास के हवा को बांधा और एक तेज हवा का झोंका अजित के चेहरे पे फेंका , पूरा बदन महक गया। एक अजीब सी मस्ती छा गयी। अजीत दिल हार गए , इस बार उन्हें सच्चा वाला सच्चा प्यार हो गया। मग़र मन मे बड़ा ही व्याकुलता हुई , एक ही दिन में दो बार इतनी सुंदर कन्या द्वारा भैया बोला जाना कहीं से कोई शुभ संकेत नही था। जरूर कोई मनहूस आंखों के आगे आ जा रहा है भोरे भोरे । अजीत बाबू ने प्रण किया की कल से वे सीधे बिस्तर से उठेंगे , आंखे पर पानी मारेंगे और  शिव मंदिर में जाके  वहीं शिव जी का पहला दर्शन करेंगे उसके बाद बाकी दुनिया देखेंगे ।
अजीत घर लौटे, रात को नींद नही आई ,उधेड़बुन  में लगे रहे जगह जगह जानकारी के लिए फोन घुमाया तो पता चला लड़की का नाम अलीज़ा था और वो प्रोफ़ेसर साहब की साली थी । प्रोफेसर साहेब जाती से मोहम्मडन थे,मग़र सज्जन व्यक्ति थे , मुहल्ले के उन चंद व्यक्तियों में से थे जिनको अजीत दिल से आदर करते थे।अजीत को उनके बेटी ज़ोया  और कुंदन के रिश्ते के बारे में पता था मग़र अपने प्रेम प्रसंग में  वो कुंदन को इन्वॉल्व नही करना चाहते थे।  बचपन से ही कुंदन को भतीजा मानते आए थे अजीत। वो भी उनको छोटे पापा बोलता था।  8 साल का अंतर था दोनो के उम्र में।
रात के अंतिम पहर तक चले अंतर्द्वंद के बाद अजीत ने टारगेट सेट कर लिया की चांद रात तक अलीज़ा उनके साथ होगी औऱ अगले दिन से ही वे इस मिशन पर लग गए , सारे पुराने चाल चल दिये , हर पैंतरा आजमा लिए। रमजान का दसवा दिन आ गया मग़र लड़की के दिल पे जो पत्थर पड़ा था वो जरा सा भी नही टरका।आख़िरकार हारकर उन्होंने अपने लँगोटिया मित्रों को इस समस्या से उबारने के लिए आमंत्रित किया। सारे के सारे पैदाइशी सिंगल टूट के आये जोड़ी बनाने। महंगी मदिरा की व्यवस्था थी ,खूब मदिरापान हुआ उसके के बाद  सिगरेट के धुओं से निजी आसमान बनाया गया, आखिरकार फिल्मों में ऐसे ही तो युद्ध की तो रणनीति बनाते है रणनीतिकार। बहुचक्रीय चर्चा हुई , बीच मे एकाध बार आपस मे हाथापाई की नौबत भी आई जिसे अजीत ने समझा बुझाकर समाप्त किया।अंत मे एक सुझाव सर्वसम्मति से तय हुआ कि शाम और सुबह के वक्त मुहल्ले के हर पब्लिक प्लेस , मसलन गेट  से लेके पार्क , जेनरल स्टोर तक पे अपने लौंडे तैनात कर दिये जायें और जैसी ही वो कन्या दिखे अजीत बाबू की वीर गाथाएँ गानी शुरू कर दी जाए। इससे कन्या उनके तरफ आकर्षित होगी।ऐसा ही हुआ कुछ दिनों तक, सब हिसाब से चलता रहा , लड़की ने एकाध बार भरपूर नजरों से देखा भी नजरअंदाज भी किया , अजीत का मन हर्ष और गम के पायदान में झूलता रहा, मग़र तैनात लौंडो में  कोई दर हरामी भी मौजूद था, या फिर अजीत बाबू की किस्मत ही पांडु हुई पड़ी थी,  एक दिन लौंडे ने लड़की को  देखते ही अजीत बाबू जिंदाबाद - जिंदाबाद के नारे लगाना शुरू कर दिए ,उसके देखा देखी सर्वत्र फैले लौंडों ने भी यहीं करना शुरू कर दिया। इससे लड़की इतनी गुस्सा हुई कि अगले दिन जब पार्क में उसकी नजरें अजीत  से टकराई तो उसने गुस्से में मुंह फेर लिया और उठकर घर चली गई।
 सारा किया धरा .....गोबर हो गया , अब चांद रात में मात्र चार-पांच दिन बचे थे, अजीत को कुछ सूझ नही रहा था, पहली बार वो अपनी जिंदगी में अपने गोल अचीव नही करने जा रहा थे। दिनभर उनके मन मे यहीं चिंतन मनन चलता रहा कि आखिर अब क्या होगा, थोड़ी बहुत बदनामी भी हो गई है इस चक्कर मे मुहल्ले में।
अंत मे उनकी सोच की सुई कुंदन पे आके टिक गई अब वहीं आस बचा था। दिमाग मना कर रहा था । उससे इस मुद्दे पे बात करने पे प्रोटोकॉल अलाउ नही कर रहा था मग़र दिल था कि बेकरार हुए बैठा था। आख़िरकार प्रेम के आगे प्रोटोकॉल हार गया , प्रेम जीत गया। अजीत ने कुंदन को फोन घुमाया ,सारी बातें समझाई। कुंदन ने ज़ोया से पूछके हामी भरने को कहा। थोड़े से मान मनौव्वल के बाद वो भी मान गई। काफी विचार-विमर्श के बाद तय हुआ कि अजीत एक सोने का मांगटीका खरीद के देंगे जिसे ज़ोया चांद रात को चांद देखने केे बाद अलीजा को देगी और बोलेगी की किसी ने अपने नम्बर के साथ आपको ये मांगटीका दिया है। और चूंकि अलीज़ा , अजीत के आंखों में प्रणय निवेदन देख ही चुकी है तो वो खुद ही बाकी चीजें जान जायेगीं
अजीत ने मांगटीका खरीदा, उसके बॉक्स के अंदर अपना कार्ड डाला और कुन्दनवा के मार्फ़त ज़ोया को भिजवा दिया।आखिर कर चांद रात का  मुबारक मौका आ ही गया। चांद देखने के बाद सब छत पे एक दूसरे को बधाई दे रहे थे की अचानक नीचे से ज़ोया की अम्मी की आवाज आई ये ज्वेलरी किसने खरीदा है, ज़ोया को काटो खून नही रहा, दौड़ते दौड़ते नीचे पहुंची, जैसे तैसे अम्मी को समझाया कि ये नकली है मग़र पानी सर से ऊपर निकल चुका था , अलीज़ा भी चली आई उसने ज़ोया का साइड लिया कि हाँ नकली ही हैं।। पर उसकी अम्मी पुराने ख्यालातों वाली थी उनके बेटी सोना छोड़ दूसरा कुछ नही पहन सकती थी , अभी के अभी गिलट को फेकने का हुक्म हुआ, ज़ोया डब्बा लिए छत पे आई वहां कुन्दनवा भी चांद के दीदार के बहाने ज़ोया को ताड़ने के लिए खड़ा था । ज़ोया ने उसका एक हाथ पकड़ के उसमे डब्बा थमाई और बोली "अपनी चाचा के लिए चाची ढूंढो या काका के लिए काकी मग़र अगले दस दिन तक शक्ल मत दिखाओ"कुन्दनवा ने सोचा कि समझाते है , लगता है घर मे डांट पड़ी है, इसीलिए बोला कि ," सुनो.........उधर से ज़ोया दुबारा फुंफकारी तुम्हारे चक्कर में पचासवी बार डांट सुन लिए होंगे हम अब बस दस दिन तक हमको फोन और मैसेज मत करना, और सुनो रिंकिया और अपर्णवा से हाल चाल जानने की कोशिश भी मत करना ,अगर अम्मी तुम्हारे और हमारे बारे में कुछ भी जान गई तो  हमारा मरा मुंह देखोगे। अब जा रहे है हम..........वो नीचे भागी।
कुन्दनवा वहीं खड़े होक डब्बा को मुट्ठी में भीचे सोचने लगा ....."कहीं ऐसा न हो कि अपनी अम्मी ढूंढने के चक्कर मे अपने बच्चों की अम्मी से हाथ धोना पड़ जाए"


【This story is written by Aakash Gaurav.】

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