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December 02, 2017

मेरी तलब

मुझे लिखने की तलब होती है,
सोचता हूँ लिखूं,
गरीबों की रोटी मे अठखेलियाँ करते नमक और तेल को,
उन हवाओं के थपेड़ों को लिखूँ जो बुझा देना चाहती है उस झोपड़ी की जलती डिबिया को,
लिखूं कभी,
चारपाई पे लेटे उस बुजुर्ग को जिसकी जवानी ही उसकी पूंजी थी,
शायद अब ईंट पीठ पे प्रेमजाल नहीं बुन पाते।
लिखूं,
उन दबती मुस्कान को जिसने उगते सूरज तो देखे,
लेकिन सवेरा नहीं देखा।
कभी कांप उठती हैं हाँथ,
जब सोचता हूँ लिखूं,
किसानो की लटकती तस्वीर,
दहल जाती है स्याही,
शब्दों में समा ही नहीं पाता वो मंजर,
गरीबी देखी नहीं है आर्थिक,
लेकिन गरीब हूँ,
क्यूंकि मेरे पास स्याही हीं नहीं है अपनी बाते लिखने को,
तलब होती है लिखने की,
लेकिन भयावह दिखती है मंजर।
हाँ, बहुत भयावह!

2 comments:

We would love to hear from precious mouths...

Story of a Bihari Antagonist.